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हिमाचल मंत्रिमंडल विस्तार में क्या हुई सुक्खू से भारी चूक ?

मंत्रीमंडल विस्तार में क्यों छूट गए अनुसूचित जाति,ब्राह्मण व कांगड़ा के दिग्गज नेता?

हिमाचल डेस्क – लंबे समय से लंबित मंत्रीमंडल का विस्तार आखिर 8 जनवरी को हो गया। परंतु सुक्खू जैसे मंझे सियासतदान से हुई जातीय व क्षेत्रीय असंतुलन की चूक या फिर सियासी हिसाब-किताब चुकता करने रणनीति को लेकर हर कोई अचम्भित है। धर्मशाला विधानसभा से पहले हुई आभार रैली से यह स्पष्ट था कि सत्र के तुरंत बाद मंत्रीमंडल विस्तार होना तय है। आभार रैली में जिस तरह से धर्मशाला के विधायक सुधीर शर्मा और विधायक रघुवीर बाली सक्रिय थे लग रहा था कि दोनों अपना प्रभाव मुख्यमंत्री पर बना कर मंत्रीमंडल में जगह बना लेंगे। ऐसा देखने, सुनने व समझने में भी आ रहा था कि ब्राह्मण व कांगड़ा से दो से तीन मंत्री आएंगे। क्योंकि, कांगड़ा ने 12 कांग्रेसी विधायकों को जीता कर भेजा है।

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क्यों छूट गए सुधीर शर्मा पीछे ?

सुधीर शर्मा ब्राह्मण नेता होने के साथ-साथ कांगड़ा राजनीति में बड़ा नाम भी है। सुधीर हाईकमान यानि 10 जनपथ में भी गहरी पकड़ रखते है और उनका नाम मंत्रीमंडल विस्तार से पहले सबसे आगे चल रहा था फिर ऐसा क्या हुआ इतना सशक्त दावेदार नेता मंत्रीमंडल में अपनी जगह नहीं बना पाया। यह बिल्कुल सही है कि सुधीर शर्मा का नाम मंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे था। परंतु उनके द्वारा विगत में की सियासी गलतियां भी सुधीर के पीछे इतनी तेजी से भाग रही थी। कि वह finishing line से पहले सुधीर शर्मा के आगे निकल गई और उन्हें मात दे गईं और वह अफसोस करते रह गए।

सियासत के खेल में हार जीत आम

सियासत के खेल में हार जीत चली रहती है, अफसोस वो करते हैं जिनका खेल खत्म हो जाता है। तो क्या सुधीर शर्मा का खेल खत्म है। क्या है उनकी इतनी भारी गलती जिसका भार उनके द्वारा आयोजित आभार रैली भी नहीं उठा पाई? जिन गलतियों ने सुधीर शर्मा को सियासी दौड़ में औंधे मुंह गिराया है वह कांग्रेस के आज के कठिन व नाजुक दौर में अक्षम्य हैं । सुधीर ने भाजपा विधायक कृष्ण कपूर द्वारा की धर्मशाला विधान सभा खाली सीट पर उपचुनाव में लडऩे से मुंह फेर लेना और फिर कांग्रेस के उम्मीदवार को चुनाव हराने में भाजपा को भरपूर समर्थन देना बहुत भारी गलती साबित हो रही है।

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टिकट आबंटन के समय हुई भूल

शायद कांग्रेस हाई कमान उनके पार्टी विरोधी रूख को भूला भी देती परंतु उन्होंने टिकट आबंटन के समय एक और भूल कर दी। सुधीर शर्मा का नाम पहली सूची में नहीं आया तो उन्होंने हाईकमान पर दबाव बनाने के लिए एक चाल चली जिसमें उन्होंने अपने साथ एक दो और टिकटार्थियों को जोड़ लिया। उन्होंने हाईकमान पर दबाव बनाने के लिए पार्टी छोड़ भाजपा में जाने की खबर फैला दी या फैलाई गई जिससे हाईकमान, जिसके साथ उनके रिश्ते बहुत अच्छे थे, बहुत आहत हुई। उन्हें टिकट तो मिल गई परंतु यह राजनीतिक भूल उनके साथ चिपक गई। जब तक वह इसके लिए गंगा नहीं नहा लेते है। इस पाप से मुक्त नहीं हो सकते है। खैर राजनीति का खेल है कभी भी पासा पलट लेता है लेकिन गंगा नहाने का तरीका आना चाहिए।

कौन-कौन ब्राह्मण नेता है मंत्री की दौड़ में

14वीं विधानसभा में 9 ब्राह्मण चुन कर आए हैं। उनमें से मुकेश अग्निहोत्री उपमुख्यमंत्री बन गए और संजय अवस्थी मुख्य संसदीय सचिव और सुधीर अपनी गलतियों से जुझ रहे हैं जब तक गलतियों से पाक साफ नहीं निकल जाते तब तक उनको मंत्री पद मिलने पर प्रश्नचिन्ह लगा रहेगा। अब छह और हैं इनमें घुमारवीं से राजेश धर्माणी, बड़सर से इंद्रदत्त लखनपाल, श्री ज्वालाजी से संजय रत्न, सुक्खू के सबसे नजदीकी नगरोटा के रघुवीर बाली, गगरेट से चैतन्य शर्मा, मनाली से भुवनेश्वर गौड़, इन छ: विधायकों में से राजेश धर्माणी का मंत्री बनना लगभग तय है बाकि पांच में से एक और मंत्री बनना है तो सबसे वरिष्ठ और तीन बार लगातार चुनाव जीतने वाले व पूर्व में मुख्य संसदीय सचिव रहे इंद्रदत्त लखनपाल है।

क्या अनुसूचित जाति को एक और मंत्रीपद मिलेगा?

हिमाचल प्रदेश विधानसभा में 10 विधायक अनुसूचित जाति के चुनकर आए हैं. और यह संख्या15 राजपूत विधायकों की संख्या के बाद दूसरे नंबर पर है। यद्यपि अनुसूचित जाति के विधायकों में से एक मंत्री और दो मुख्य संसदीय सचिव मुख्यमंत्री सुक्खू ने बना दिए हैं. फिर भी अगर दो ब्राह्मण मंत्री बनते हैं तो एक मंत्री पद खाली रहता है तो यह पद अगर अनुसूचित जाति को जाता है। तो कौन इसका दावेदार है वरिष्ठता के आधार पर विनय कुमार और नंदलाल हैं परंतु शिमला और मंडी संसदीय क्षेत्र से पहले ही मंत्रिमंडल में कोटे से ज्यादा मंत्री बने हैं।

कांगड़ा के सियासी समीकरण

अब कांगड़ा और हमीरपुर से देखें तो हमीरपुर से दो और कांगड़ा से भी दो ही अनुसूचित जाति के विधायक हैं, किशोरीलाल मुख्य संसदीय सचिव बन चुके हैं । इन 4 विधायकों में से वरिष्ठ यादविंद्र गोमा है गोमा दूसरी बार विधायक बने हैं समझदार हैं पढ़े लिखे हैं परंतु मौजूदा राजनीति में तटस्थ भूमिका पसंद करते हैं। लेकिन सियासी गुणा- भाग वह अंक हैं जो कांगड़ा के सभी समीकरणों को भाग देकर शून्य कर सकता है. इसके अलावा भोरंज के सुरेश कुमार संगठन में जिला स्तर से राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में विभिन्न पदों पर रह चुके हैं और मुख्यमंत्री के घनिष्ठतम लोगों में से हैं। और मंत्री बनने कुव्वत तो रखते ही है इसके अलावा हमीरपुर संसदीय क्षेत्र का महत्वपूर्ण मोहरा है जो समूची सियासत को पलट सकता है।

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